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ForwardPress.in Target Audience: Individuals from backward castes as well as readers and researchers on Indian subaltern issues and interests from a Phule-Ambedkar Dalitbahujan perspective. Since the issues are addressed from multi-faceted angles by multi-disciplinary contributors the target audience too will be from a wide range of disciplines and interests including, but not restricted to, anthropology, sociology, politics, economics, literature and folk culture. Source
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| Scope | Asian |
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| Language | English, Hindi |
| Country | India |
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Search Articlesआइए, मंडल कमीशन की रिपोर्ट को समझें (पहला भाग)
“जातियां हिंदू सामाजिक संरचना की बुनियादी आधार हैं।… जाति ने हिंदुओं को अनेक समूहों में बांट दिया है, जिन्हें ऊंच–नीच के श्रेणीक्रम में व्यवस्थित किया गया है।”[1] “जातियों के इस कर्मकांडीय (धार्मिक) श्रेणीबद्ध व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि उच्च जातियों में गहरे स्तर पर निहित स्वार्थ पैदा हो गए। उच्च जातियों को इस सामाजिक संगठन के संस्थागत ढांचे के माध्यम से निम्न जातियों का शोषण करने का मौका मिला। … इस प्रक्रिया में शासक वर्गों (उच्च जातियों) ने विभिन्न उपायों के माध्यम से अपने विशेषाधिकारों को...
मेरी यादों में बी.पी. मंडल
स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति ने एक लंबी यात्रा तय की है। इस यात्रा में कुछ ऐसे निर्णायक मोड़ भी हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदल दी। इनसे होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव न सिर्फ राजनीतिक परिदृश्य तक सीमित रहा बल्कि भारत की सामाजिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित किया और एक नए दौर की शुरुआत हुई। इस नए दौर का श्रेय बी.पी.
Review: Kancha Ilaiah Shepherd’s ‘Harappa: God’s City of Civilisation’
Few Indian public intellectuals have challenged the ideological foundations of Indian history and society as relentlessly as Kancha Ilaiah Shepherd. For more than three decades, beginning with his landmark book Why I Am Not a Hindu, followed by influential works such as Buffalo Nationalism and Post-Hindu India, Prof Ilaiah has consistently argued that India’s productive castes, the Shudras, Dalits and Adivasis, have been written out of the nation’s intellectual and civilizational story.
मध्य प्रदेश : बालाघाट में 19 आदिवासी बच्चों की मौत
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल बालाघाट जिले में एक के बाद एक 19 आदिवासी बच्चों की मौत हुई हैं। ये बच्चे 1-14 वर्ष की उम्र के थे। ये मौतें जिले के बिरसा विकासखंड के ग्राम बोंदारी, कुंडेकसा और कोरका सहित कई गांवों में हुई हैं। ये गांव जिला मुख्यालय से करीब 60 से 90 किलोमीटर की दूरी पर हैं। बोंदारी गांव में पहली मौत 16 जून, 2026 को रूपलाल धुर्वे की हुई। इसके बाद 28 जुलाई को पूजा धुर्वे, 31 जुलाई को सचिन मरकाम और 12 अगस्त को प्रियंका धुर्वे की मौत हो गई। ऐसे ही कोहनीमोडटोला गांव के लमनिन धुर्वे की...
The rush to delete the digital archive of resistance
A protest can end in a day. Its digital record can shape public memory for decades. So what happens when the record is quietly erased – one reel at a time? The latest crackdown on the July student protests led by the Cockroach Janta Party (CJP) involves social media platforms, which are facing growing pressure from the Indian government.
बिहार में सामंती उत्पीड़न और दलित-पिछड़े मजदूरों पर बढ़ते हमले
बिहार में भाजपा के सत्ता में आने के बाद राज्य के ग्रामीण इलाकों में सामंती उत्पीड़न की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इन घटनाओं में केवल व्यक्तिगत अपराध ही नहीं, बल्कि जातीय वर्चस्व, बंधुआ मजदूरी, भूमिहीनों की जमीन पर कब्जा और प्रतिरोध करने वाले दलित-पिछड़े समुदायों को दबाने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं। रोहतास के मिल्की मनिहारी और नवादा के रामगढ़ की हालिया घटनाएं इस व्यापक सामाजिक स्थिति की गंभीर तस्वीर पेश करती हैं। बीते 5 अगस्त, 2026 को रोहतास जिले के मिल्की मनिहारी गांव में नोनिया जाति...
‘जातिगत जनगणना जातियों के नाम की गणना नहीं’
[यह पत्र (पत्रांक जीओआई/पीएम-01/08/26/एमपी/करुर, दिनांक 15 अगस्त, 2026) तमिलनाडु के करुर लोकसभा क्षेत्र की सांसद एस.
जानिए, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत रामस्वरूप वर्मा के बारे में
आजाद भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन के क्षेत्र में महामना रामस्वरूप वर्मा का अवर्णनीय योगदान रहा। वे नीति, सिद्धांत के पक्के ईमानदार राजनेता, समाज सुधारक, सफल अर्थशास्त्री, कुशल प्रशासक, लेखक, संपादक और हिंदी प्रदेश में हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) के गौरीकरन नामक गांव में एक किसान परिवार में 22 अगस्त, 1923 को हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और कानून की भी...
पिछड़े वर्ग की चेतना की कीमत पर जातिगत जनगणना करा रही सरकार
सौ में नब्बे होने और उसके अनुपात में दावेदारी का नारा क्यों आया? बहुजन का नारा क्यों आया? पिछड़े वर्ग का नारा क्यों आया? दलित राजनीति के केंद्र में कैसे आए?
जातिगत जनगणना : हाथी नहीं, हाथी की पूंछ
जिसकी आशंका थी, वही हुआ। यानी जातिगत जनगणना हवा-हवाई घोषणा के सिवा कुछ नहीं निकली। जातिगत जनगणना की राष्ट्रव्यापी मांग के मद्देनजर 25 अप्रैल, 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णय लिया गया था कि जातिगत जनगणना अलग से सर्वेक्षण के रूप में कराने के बजाय मुख्य जनगणना में शामिल की जाएगी। जातिगत जनगणना की मांग का एक गहरा सामाजिक और आर्थिक पहलू था। सामाजिक न्याय की पक्षधर सरकारों को मुख्यधारा से पिछड़े समाज की आर्थिक हैसियत, जमीन-जायदाद और वास्तविक स्थिति का पता लगाना चाहिए था। लेकिन पहले...