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Articles by Fauzan Arshad
The Government Of Good Governance Of Bihar Is Indulging In Corruption And Bureaucracy.
बिहार में बाढ़ का समय है, कोरोना का दौर भी है। लोगों में बेरोजगारी अपने चरम पर है और स्वास्थ्य सेवाओं शिक्षा की हालत पहले से वर्तमान में बेहद ज़्यादा खराब है। वैक्सीनेशन को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है। वहीं दूसरी ओर सरकार के अपने खोखले और झूठे दावे हैं। सरकार की तरफ से की जाने वाली कोशिशों की बातों को मान भी लें, तो आम जनमानस पर अफसरशाही इस कदर हावी है कि जो सेवाएं लोगों को मिलनी चाहिए थीं या उन तक समय रहते हुए पहुंचनी चाहिए थीं, वो नहीं पहुंच पा रही हैं। पिछले 10 सालों से GDP विकास दर...
आधे से ज़्यादा शिक्षक अयोग्य, कैसे सुधरेगी बिहार की शिक्षा व्यवस्था?
बिहार की शिक्षा व्यवस्था कैसी है ये जगज़ाहिर है। लेकिन इसी बीच कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जो लगातार ये दावा करते हैं, कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था में बहुत सुधार हुआ है। सुधार हुआ है, बेशक हुआ है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन सवाल ये है की आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी बिहार में शिक्षा का स्तर देश के बाकी राज्यों के मुकाबले काफी पिछड़ा हुआ क्यों है?
क्या हिजाब को लेकर असहजता जायज है?
अभी हाल ही में हिजाब या बुर्का को लेकर कई लोगों ने अपने-अपने समझ के हिसाब से बहुत सी बातें की और कहीं और इसे अपने समझ के हिसाब से परिभाषित किया। आइये सबसे पहले हम हिजाब का मतलब समझते हैं कि आखिर हिजाब होता क्या है? क्योंकि ज़्यादातर आबादी इसको समझना नहीं चाहती या उनकी समझ इसे मुस्लिम महिलाओं का शोषण करने वाला पोशाक समझती हैं, क्या सच में ऐसा है?
इंस्टाग्राम, टि्वटर और फेसबुक की अतरंगी दुनिया
सोशल मीडिया, जब भी ज़हन में यह शब्द आता है तो सबसे पहले मेरे मन में लाइक, कमेंट और शेयर आता है। कोरोना महामारी के कारण लोग भले ही एक-दूसरे से दूर हैं लेकिन सोशल मीडिया ही वह माध्यम है, जिसके ज़रिये आज दुनियाभर के तमाम लोग एक-दूसरे से संचार कर पा रहे हैं। देखा जाए तो आज वह हर व्यक्ति सोशल मीडिया का उपयोग कर रहा है, जिसके पास स्मार्टफोन है। पलक झपकते ही आप अपने सोशल मीडिया अकाउंट से लाखों लोग, जिसमें आपके दोस्त, आपके रिश्तेदार आदि लोग शामिल हैं, उन तक अपनी बात को पहुंचा सकते हैं। सकारात्मकता के...
Farm Bills 2020: The Protests Have Died Down But The Issues Remain Unresolved
Strangely enough, no voice seems to have been raised against the farm laws in all the campaigning for Bihar elections. Needless issues are raised, but no powerful protest comes up in the fiercely-fought tussling of this caste-dominated electoral arena. It is Punjab that has formally rejected the three agriculture sector legislations, with its Legislative Assembly unanimously passing three Bills to negate the Union laws.
क्या बिहार के प्रवासी मज़दूर नीतीश कुमार पर भरोसा कर पाएंगे?
प्रवासी मज़दूर, महिला मतदाता और देशभर में 21 मिलियन से ज़्यादा मिसिंग महिला मतदाताएं जिनकी अच्छी खासी तादाद बिहार में भी है, वे बिहार विधानसभा चुनाव पर असर डाल सकते हैं। अगर सरकारी दावों की बात करें तो कोरोना काल में देशभर से घर लौटे एक करोड़ से ज़्यादा मज़दूरों में से 50 लाख से ज़्यादा मज़दूर अकेले सिर्फ बिहार के थे। ऐसे में ये मज़दूर बिहार सरकार के लिए चुनावी मौसम में सर दर्द बन गए हैं। पहले उनके वापसी के समय जब वे रास्ते में थे तब सरकार को खरी खोटी सुननी पड़ी थी। वहीं, पहुंचने के बाद बिहार में उनके...
Do We Want Sensible Journalism Or Sensational Journalism?
Right now, some times in the past, the media has shown a face that was seen rarely or never seen before. The only purpose of the current journalism revolves around getting the highest TRP and become देश का सबसे बडा न्यूज चैनल (the biggest news channel in the country). Even the Supreme Court pointed out that there is a strict requirement for media houses to redefine the values, fundamental rights freedom, and also to understand the right to privacy.
Dear Indian Media, Shouldn’t The Burden Of Conducting Trials Be Left To The Courts?
The law is blind; it doesn’t hold any preconception or prejudice against any person. It treats a layperson and a celebrity the same way. However, these days the fourth pillar of democracy has misunderstood, rather intentionally misunderstood, the role of law. The main function of mass media is to reach out to thousands of people and spread the correct information regarding everything happening around the world.
क्या पत्रकारों का काम अफवाह फैलाना है?
“मोर न्यूज़ इज़ गुड न्यूज़” लेकिन यह कथनी अब बदल चुकी है। अब ज़्यादा के साथ-साथ खबरों का सनसनीखेज़ और भड़काऊ होना भी ज़रूरी हो गया है। सबके लिए नहीं लेकिन ज़्यादातर लोगों और न्यूज़ चैनल्स या खबर से जुड़ी दूसरी संस्थाओं के लिए। मतलब, वह ज़माना और था जब ज़्यादा खबरें अच्छी मानी जाती थीं। आज भी मानी जाती होंगी लेकिन वैसी पत्रकारिता उंगलियों पर गिनी जा सकती है। युवाल नोआह हरारी अपनी किताब में लिखते हैं, “पत्रकारों का काम अफवाह फैलाना होता है।” पहले तो इसे पढ़कर मैं चौंका फिर दोबारा पढ़ा। बात वही थी, आगे पढ़ा...
टीआरपी के जुगाड़ में मीडिया आपके मुद्दों के अलावा सुशांत-रिया, दीपिका, कंगना सब पर बहस कर रही है
बॉलीवुड मात्र एक इंडस्ट्री नहीं, देश का नंबर वन पचिंग बैग है। आपको जहां कहीं का भी गुस्सा हो, सड़क टूटी हो, मंदी छाई हो, घोटाले हो रहे हों, भूख से जनता मर रही हो, बैंकों में फंसे खुद के ही पैसे के लिए लोग कतार में खडे हों, पेट्रोल के दामों से परेशान हों, कुछ भी हो, आप सारा गुस्सा बॉलीवुड पर निकाल सकते हैं। यह सुविधा आपको विश्व की किसी संस्थान में नहीं मिलेगी। आप उस युवक के चेहरे का भाव देखिए जिसने अभी-अभी खबर पढ़ी हो कि अब होगी बॉलीवुड माफिया की जांच, सुशांत केस में आया ड्रग एंगल, रिया गई...
The Govt Claim The Farm Bills As Farmer-Friendly, While Critics Say The Contrary?
The Union Cabinet passed three agriculture ordinances in June 2020, claiming them to be farmer-friendly. What Are The Three Bills? The Farmers Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020 The Farmers (Empowerment and protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Bill, 2020 The Essential Commodities (Amendment) Bill, 2020 The First Bill The first Bill allows barrier-free trade of farm produce.
साइबर बुलिंग का ट्रेंड लगातार बढ़ता क्यों जा रहा है?
तकनीक और सोशल मीडिया के विस्तार के साथ ही तेज़ गति से साइबर बुलिंग का भी विस्तार हुआ है। जैसा की एक कहावत है, “शब्द घाव देते हैं, अफवाह लोगों को बर्बाद करती हैं लेकिन बुलिंग इंसान को मार देती है।” क्या होती है बुलिंग?
मज़दूरों का पलायन, बाढ़ और बेरोज़गारी जैसे मुद्दे क्या बिहार चुनाव पर डाल पाएंगे असर?
पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी बिहार चुनाव अपने टाइमिंग और देश की सियासत में चल रहे उथल-पुथल के कारण काफी महत्त्वपूर्ण हो चुका है। पिछली बार जहां नीतीश कुमार महागठबंधन का हिस्सा थे और बीजेपी के विरुद्ध ताल ठोक रहे थे, वहीं इस बार कहानी उल्टी है। क्या होंगे इस बार चुनाव के मुद्दे?
A Boon Or A Bane?
Teenage is the phase of life where the children go through a lot, mentally and emotionally. In the notice of everybody, one can easily understand the legitimacy and importance of the adolescent stage of children. We know that as a generation passes, the perspectives of people also gradually change. No doubt things were harder in ancient times, people lived a little critical life back then, but now things have changed.
‘Shaping Peace Together’ This International Day of Peace, 2020
The Father of Nation Mahatma Gandhi said, “There is no path to peace, peace is the path”. On 21st September each year, the International Day of Peace also known as Peace Day is observed around the world. It was established in 1981 by the United Nations General Assembly(UNGA). Two decades later in 2001, the United Nations General Assembly augmented for “non-violence and cease-fire” on world peace day and calls on everyone and every country to observe Twenty Four hours of non-violence.
मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रह से आखिर कब तक ग्रसित रहेगा देश?
भारत जो कभी ऋषियों, मुनियो, सूफी संतो का देश कहा जाता था, आज अपनी उस पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। पिछले कुछ बरसों में लोगों की सेंटीमेंट बहुत ही रिकॉर्ड गति से कमज़ोर हुई है। सेंटीमेंट इतना कमज़ोर हो चुका है कि किसी के गाली भर दे देने मात्र से उसको मौत के घाट उतार दिया जाता है। सहनशक्ति लगभग खत्म हो चुकी है, रोज़ाना हम पांच-दस रूपये के लिए मौत की खबरें पढ़ते हैं। संवेदनाएं मर चुकी हैं। सहनशीलता अपनी अंतिम सांसे गिन रही है। कल हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल दी जाती थी लेकिन आज लोग खुले तौर पर...
जाति और धर्म की राजनीति के आगे कैसे चुनावों से युवाओं के मुद्दे हो जाते हैं गायब?
हमारे देश में डिजिटल इंडिया, कंप्यूटर, टेक्नोलॉजी, रिसर्च और विकास जैसे मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाला तबका जाति और धर्म से ऊपर उठकर बात करता तो ज़रूर दिख जाएगा, मगर यही तबका वोट डालते वक्त सारी बातें भूल चुका होता है। इसके अनेकों उदाहरण आपको विशेषकर उत्तर भारत के दो प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में देखने को मिल जाएंगे, आज हम बात करने जा रहे हैं बिहार की क्योंकि अभी बिहार विधानसभा चुनाव होने वाला है और सारी राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी जुगलबंदी में लगी हुई हैं। जातिवादी राजनीति का...
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